#Kavita By Acharya Amit

तुमने सुना नही शायद
मैने तो कहा था
उस शान्त चुप्पी से
जो हम दोनों के
दरम्यां अक्सर रही है
कभी आदत बनकर
कभी उसकी अभिवृत्ति बनकर
मेरी आकांक्षाओं को
विस्तृत रुप तुम्ही से मिला है
भले ही उनमें आक्षेप
मेरा शामिल रहा हो
वो निर्बोध अबोध शब्द
जो कभी जुड नही सके
हमारी अभिव्यंजना की अभिव्यक्ति बनकर
उन्ही के सामन्जस्य से पुलकित हो
मेरे अनकहे संवाद
पुकारते रहे है तम्हें
तुमने शायद सुना नही
मेरा तुम्हारे समक्ष
मौन होना ही
कभी भी अर्थहीन नही रहा
तम्हें ज्ञात हो जाए
लेकिन तुम अब
मौन-मूक और
शान्त ही बने रहना
मैने इसी शान्त रहने में
समझा लिया है खुद को…..
आचार्य अमित

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