#Kavita By Acharya Amit

दुविधा…
दुविधा है सुविधाओं की
सुविधा है दुविधाओं की
प्रतिपल पर केंद्रित है
आमदनी इच्छाओं की
प्रीत की रीत को
पर लग गए
जाने वो कौन दिशा गई
स्वार्थ अमूल्य जुड़ गया है
जब से प्रीति अधर गई
सिद्धि है मान्यताओं की
धर्म का आडम्बर कहो
या जात-पात का ढकोसला
भाषा -भाषी भेद कहो
या रंगभेद का हो मसला
कीर्ति है आक्रांताओ की
मन के वश में क्या रहा
जब इंसान के वश में
मन ही न रहा
रिश्तें का धन निर्धन से पूछो
जिसने ढोया हर रिश्ता
जिसने चुकाई सभी किस्तें
फिर भी हार गया बेचारा
जीत के प्रयास में
हर रिश्तें
चिंता है चिताओं की
दुविधा है सुविधाओं की
सुविधा है दुविधाओं की…..
आचार्य अमित

Leave a Reply

Your email address will not be published.