#Kavita By Acharya Amit

अश्रुपूरित श्रधांजलि…

अंधकार के इस अंधकूप में
जाने गिरा गया है कौन
चूड़ियां टूटी सुहागिनों की
बच्चों की वो साख गई
पिता कहते है जिसे
घर-घर की वो आँख गई
माँ की गोद से अभी उठकर
जाने यह गया है कौन
गूंगे अल्फ़ाज़ हो गए
फ़िज़ा हो गई है मौन
अंधकार के इस अंधकूप में
जाने गिरा गया है कौन
आतंकी का आतंक था
यह कहर गया बरपाया है
पुलवामा के शहीदों को
किसकी बलि चढ़ाया है
होली से पहले ही हल हो गई
जाने कितनी अनगिनत सांसें
एक सादा से जीवन में
यह घुसपैठ कर गया कौन
सब अपनी अपनी मांद घुसे है
अब उन उजड़े घरों की
फ़िक़्र करेगा कौन
बेबस आंखे ज़वाब तलब है
क्यों आप सब अनजान बने
इस तरह बैठ गए है मौन….
जो खालीपन दिए जा रहे
उस खालीपन में अब रहेगा सूनापन
अश्रु जाने कब तक गिरेंगे
दिल की जमीन पर
यह कह नही सकते
बस इतना ही कह सकते है
आपके बिना रह नही सकते
जो खुशियाँ साथ तुम्हारे थी
अब वो याद बन दामन थामेगी या
विस्मृत कर हमें खुद से
तुम्हारा मान बढ़ाएगी
यह कह सकता है कौन
मौन का मौन ही साथ रह गया
मौन को बनाकर मौन
अंधकार के इस अंधकूप में
जाने गिरा गया है कौन…..

आचार्य अमित

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