#Kavita By Acharya Amit

मैं जो हुँ
तेरे बिना
वो भी नही
कैसे कह दूं
तू मेरे वज़ूद में
कहाँ नही है
जहां धड़कती है धड़कन
जहां कुकमुलाती है ज़ुस्तज़ु
जहां बाहें पसारे
दिन उगता है ढलता है
जहां अग्न भी
तपन बन जाती है
उन सभी के साथ
तुम भी तो बसती हो
कुछ रचती हो
गढ़ती हो मढ़ती हो
कुछ तोड़कर नया करना
तुम्हें बखूबी आता है
यह अलग बात है
तुम्हारा यह अंदाज़
कितनों को लुभाता है
थोड़ा सा लोभ
तुमने मुझमें भी
पैदा कर दिया है
इस दिल को भी वही चाहिए
जिस खुशबू से तुमने
यह जग सारा गढ़ दिया है……
आचार्य अमित

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