#Kavita By Acharya Amit

जाने क्या बात है
जो कहते तुम नही
और सोचते हम रहते है
समझते तुम नही
और समझाते हम रहते है
तुम एक इशारे में
दुनियां बयाँ कर देते हो
हम एक किताब में भी
एक अल्फ़ाज़ न कह पाते है
जाने क्या बात है
जो तुम कहते नही
कुछ न कहना भी तुम्हारा
एक मुसलसल सिलसिला
बना जाता है सवालों का
एक मुस्कुराहट तुम्हारी
अदावतों की नैमत बन
बरसती है धूंप में गमों की
सुख की छांव बनकर
तुम्हारे वो सभी एहसास
जो न कह सके हो तुम कभी
न मुझसे और न कभी खुद से
अचानक वो ज़ाहिर होने लगते है
सीप सी आंखों से
असंख्य मोती बनकर
उन मोतियों का
कोई मोल नही है
दुनियां में
वो अनमोल धरोहर
तुम अपनी
मुझ ग़ैर पर
यूँ न लुटाओ
यह तमनाओँ की रँज़िशें है
जो खाली कर देगी
एक दिन तेरा मेरा अंतर्मन
निकाल फेकेंगी
हर फरेब को
दिल के कोनों से
और पहुंच जाएगी
अपनी उस मन्ज़िल तक
जिसका नाम मुहब्बत है
वो मुहब्बत जिसमें शिद्दत है
भूख नही है ज़िस्म की
एक समर्पण है
आत्मा का आत्मा से
रूहानियत……
रुमानियत का ताज ओढ़कर
सब कुछ अपनी
आग़ोश में भरकर
एक दिन
तुमसे भी कहेगी
जाने क्या बात है
जो तुम कहते नही ……
आचार्य अमित

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