#Kavita By Acharya Amit

जब ठौर चढ़
गई राधा
जब कान्हा को
सुध राधा की आई
बिन ठौर राधा
जब भटक रही व्रन्दावन में
तब जाने कान्हा ने
क्या सुध बुध बिसराई
वो नित नैनो की
पालकी में
सपने सजाये मोहन के
मोहन की अंगनाई से
और भी मुस्काई
टोह रहे कान्हा उसे
वो भी सब समझ रही
राधा कान्हा की बंसी है
सब जान अधरों पर
थिरक रही
जब साथ दोनों
मिल जाते है
तब राधेश्याम कहलाते है
कहने वाले तो
यह भी कहे
वो दो नही एक हो जाते है
जिनके मन मे
स्नेह वन्दन है
वो राधे-राधे कहते है
राधेश्याम तो हमनाम है
हर प्रेमभाव में
उभर आते है……
आचार्य अमित

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