#Kavita By Acharya Amit

हम एक हो रहे है
अनेक बनकर
प्यार भी हमारा
एक अपराध की तरह है
जो खुलकर नही
मौक़ा देखकर
जाति-भाषा धर्म और
हैसियत देखकर
निभाया और किया जाता है
कट्टरपंथी बनकर
हम धर्मनिरपेक्ष हो रहे है
ज्ञान की अज्ञानता ने
हमारी आंखे मूंद रखी है
जेब खाली है
ज़ैह्न खाली है
दिल तो शायद
नाम का रह गया है
हम स्वर्ण है दलित है
पांडे है शर्मा है
खान है बिस्मिल है
खन्ना है जॉनी है
राम है रहीम है
बस इंसान नही है
हम फेक हो रहे है
नॉट देख-देखकर
सभी रिश्ते नाते
मतलब के रह गए है
कबीर मिर्ज़ा ग़ालिब
सब यही कह गए है
जिसको तलाश रहे है
हम मन्दिर-मस्जिदों में
गुरद्वारों गिरजाघरों में
उसको तलाश हमको
अपने भीतर कहीं करनी है
हम घूम रहे है बाहर
अफसोस ढूंढ रहे है बाहर
बस यही अपनी करनी है
मेरा तुम्हारा जाने
कब हमारा बनेगा
अच्छा था वो ज़माना
जब अंग्रेजों ने
हमें छला था
भूखे थे नंगे थे
अनपढ़ थे ज़ाहिल थे
पर हम एक हुआ करते थे
थे जब भी कुछ शैतान
जो हमें ठगा करते थे
हम पढ़ रहे है
हम लड़ रहे है
हम बढ़ रहे है
मौन हो रहे है
हम अपने ही दफ़न क़ब्रिस्तान में
हम वज़ूद खो रहे है
अपने ही दिलों-जहाँ में
खोखले हो चुके है
हमारी आशाओं के शिखर अब
अब चुन हो रहे है
मान्यताओं के आधार ब्रह्म
जीवन मूल्य आधारहीन हो रहे है
उल्लुओं की पहरेदारी में
सब लीन हो रहे है
भेड़ियों का यह शाश्वत शासन
हमें नौंच-नौंच खायेगा
हमारे ह्रदय का पंछी
अब अपना असीम
अम्बर खो जाएगा
रंग-बेरंग कर दिया है
हमने अपनी ही ज़िन्दगी को
दोषी हम खुद है
और दोष दे रहे है किनको
हम मिट्टी हो रहे है
ख्वाहिशों में दबकर…….
आचार्य अमित

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