#Kavita By Acharya Amit

बैर का रंग…..
होली के रंगों से
रँगी हुई है फिजाएं
रंग रहे है पुष्प
रंग रही है खिजाएँ
बहरे हुए है
अलम है जो
दिल से आशना थे
अब भटक रही है
हिंसा और
तन रही है भुजाएं
सड़े हुए आदर्शो को
फिर से भुनाने की
पुरज़ोर कोशिश में
सब आलमगीर
राजनीतिक पार्टियां
महागठबंधन के रंग में
रंगती नज़र आ रही है
जो पुलवामा में शहीद हुए
वो मुद्दा-ए-मुअम्मा है
जो घर लौट आया
उसका ह्रदय से अभिनंदन है
कौन कहाँ किस
रंग की बाट जोह रहा है
यह कहना ज़रा मुश्किल है
पढ़े-लिखे लोग अब
चाय और पकोड़े
बेचने को आतुर है
जो देश के सरताज़ है
वो देश को बेचने को आतुर है
सबको रंग रहे है
वो अपने ही एक
अलहदा रंग में
और बात कर रहे है
बेकारी की
लालच की
कालेधन की
विकास की
और शायद सर्वनाश की
उनका रंग अमीरों के
सर चढ़कर बोल रहा है
युवा पीढ़ी की रंगों
राम नाम बनकर
ज़हर घोल रहा है
राम-अल्लाह!नाम ही अलग है
इनके पुकारने वालों का
बस ईमान ही अलग है
दोनों सूरतों में
सब नेक हो रहे है
देखों रंगों की एकता
हम एक से अनेक हो रहे है
किसको दोष देते हो भाई
कौन सी राजनीतिक पार्टी है
जो सच में भाईचारा है लाई
जिसने बिगुल बजाया है
उसी की जान आफत में है आई
जनता जब तक न जागेगी
बस इतना समझ तब तलक
यह बेबाक़ स्याह रंगों की होली
यूँही ज़िन्दगी को स्याह और
रुसवा करती रहेगी
ग़मो की पिचकारी से
मानवता चीत्कार करती रहेगी
अभी भी वक़्त है
शिक्षित बनो
संगठित रहो
अपना दुःख ज़माने से नही
अपनी अंतरात्मा से कहो
जो हुआ बहुत हुआ
अब बैर के इस रंग को
भेद को इस रंग को
बिल्कुल न सहो……
आचार्य अमित

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