#Kavita By Acharya Amit

अभी रंग शेष है
कुछ तो विशेष है
अनकहा सा अभेद है
कुछ तो अशेष है
अभी रंग शेष है
मतभेदों को भुलाकर
नीतियां मिलन की बनाओ
जो भी असहज है
अनदेखा है
अनसुना है
उसको समरसता के
सूत्र में मिलाओ
कह दो इस दुनियाँ से
संग अभी शेष है
रंग अभी शेष है
उम्मीदों का
उल्लास का
हर्ष का
भाव का
चाव का
किसी के लिए
जात-पात
किसी के लिए
धर्म-मज़हब
किसी के लिए
रिश्ते-नाते
किसी के लिए
दोस्त-मरहम
किसी के लिए
दवा-दारू
किसी के लिए
जीत-हार
किसी के लिए
मिलना-मिलाना
किसी के लिए
प्यार-मुहब्बत
हर एक रंग के
अपने ही मायने है
हर मायने का
मुआयना अभी शेष है
अख़बार में भी आ गया है
रंग अभी शेष है
कहीं ग़ैरत का
कहीं औरत का
कहीं शौहरत का
कहीं महफिलों के दौर
कहीं तन्हा महफिलें
कहीं रंजोगम है
तो कहीं खानाबदोश क़ाफ़िले
कहीं रहगुज़र से भटके मुसाफ़िर
तो कहीं मन्ज़िल को
तलाशते रास्ते
कहीं बिछड़ रहे है
तो कहीं मिलते रास्ते
कैसे कहूँ मैं आपसे
मंज़िले अभी शेष है
इन सभी गुलदस्तों में
महक अभी शेष है
सच कह रहा हूँ दोस्तों
रंग अभी शेष है…..
आचार्य अमित

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