#Kavita by Acharya Amit

इश्क़ मेरा तुझसे

कब जुड़ गया

कुछ पता न चला

जाने कब एक रिश्ता

वो गढ़ गया

कुछ पता न चला

दीवारों को फांद कर धर्म

मज़हब और भाषाओं के

सब आडम्बर छोड़कर

समाने लगे एक दूसरे में

आदतें होने लगी अब

एक दूसरे को समझने की

बिगड़ने लगे हालात

अब ज़्यादा समझदारी में

तंग होने लगे रिश्तें दिलों के

अब आपसदारी में

मर्म मरने लग गया

चांद घटने लग गया

दिल पिघलने लग गया

तेरा अहद जबसे घट गया

मैं अपने मे सिमट गया

तेरी यादों की मैली चादर लिए

बिछौना मेरा बन गई

तेरी मुस्कुराहटें…

आचार्य अमित

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