#Kavita by Acharya Amit

एक अधूरे सपने को

पाने की सब्र शर्त है

यह वक़्त का फ़ैसला है

या नियति की नीयत है

आहार वही है जो

आधार बना हुआ है

हर एक रिश्ता यहां

व्यापार सा बना हुआ है

संवाद कोई नही कहता

सब मूक बने फिरते है

अपने ही उजालों में

इनके अंधेरे घिरे फिरते है

फ़िक़्र है पल पल की

सेहत अपनी खोने में जुटे है

काग़ज़ों को जुटा रहे है

बचाने को आशियाना

क्या कहने इनकी बचत के

सर से पांव तक स्वार्थ में

रिसें हुए है

बोलते हुए अब उनके

अल्फ़ाज़ भी तंग है

क्या बादशाहत तुम्हारी है

ऐ ज़िन्दगी निगाहें

अपनी झुकी हुई है

संग हो गए है संग में न रहकर

ढंग बदल रहे है क़ायनात के

सपनों में सिमटकर

नही जानते है क्या क़ुदरत है उसकी

भूल चुके है महिमा परमार्थ की….

आचार्य अमित

 

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