#Kavita by Acharya Amit

इश्क़ की मुराद

जब दिल मे

घर कर जाती है

बची हुई सांसे भी

बावफ़ा हो जाती है

इंतज़ार अखलाक़ में

रास आने लगता है

हर कोई उसके नाम पर

हमें आज़माने लगता है

बेख्याली है ख़ुमार है

यह इश्क़ का शुमार है

रज़ा है वक़्त की

मिला दर्द बनकर उपहार है

आंखों में अक़्स उसी का है

लबों पर भी ज़िक्र उसी का है

सज़दा भी उसी का है

और सज़दे में सिर खुदी का है

बनकर आंसू आंख से

दियासलाई से बहते है

लोगों के बीच महफ़िल में

हम अक़्सर तन्हा रहते है

कोई कहे दीवाना हमें

कोई लैला का मजनू कहते है

किस्से सुनने वाले हीर के

हमें उसका रांझा कहते है

इश्क़ के मायने बड़े करामाती है

कभी आशिक़ तो कभी पागल

हमें लोग कहते है….

और एक वो है जो

इस सब से बेख़बर है

और अपनी खुशख़्याली में

वो गुम रहते है…

आचार्य अमित

 

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