#Kavita by Acharya Amit

इश्क़ की तज़वी नमाज़ों सा मैं पढ़ता हुँ

खुदाया ख़ैर हो सब पर

दुआ यह रोज़ करता हुँ

तू ही तो अब्र है मेरा

तू  ही तो सब्र मेरा है

मेरा उजियारा भी तू ही

तू ही मेरा अंधेरा है

सुबह भी तू है मेरी

तो शाम भी तू ही

तू है आम भी मेरी

तू ही अब ख़ास मेरी है

मिले है दिल जब अपने

मिलन में फिर क्या देरी है

अज़ब बाते है ग़ज़ब से लोग कहते है

मकानों में जो रहते है

घरों को चोट कहते है

मेरी दिलबर तेरा ही

नाम लब पर है

खुदाया ख़ैर हो सब पर

अश्क़ नमी बनकर कहते है

आचार्य अमित

 

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