#Kavita by Acharya Amit

दृश्य बदल रहा है

छवि धूमिल होने को है

कृत्य कलंकित हो रहे है

साझा हो रहे है अलगाव

मस्तिष्कपटल पर आगन्तुक

बन रहे है यादों के झरोखे

सीमित हो रहा है दायरा

आनन्द हो रहा है विभोर

संग हो रहे दिल

काग़ज़ की भेंट

चढ़ रही है जिंदगी

रिश्ते हो रहे है बाज़ारू

मतलब हो रहे है ख़ास

दर्द छन रहा है रिश्तों में

आस पिस रही है किस्तों में

स्नेह छूट रहा है हाथ से

साथ टूट रहा है साथ से

मौत आ रही है जिंदगी को

दीमक खा रही है सहारों को

हम भर रहे है दरारों को….

!! आचार्य अमित !!

Leave a Reply

Your email address will not be published.