#Kavita by Acharya Amit

मेरा दिल जब तुम्हे याद करता है

सच कहता हूं आईने ऐ दिल भी

यही फ़रयाद करता है मेरा अक्स

तुम्हारे अक्स से जुदा तो नही है

हाँ मैं और तुम दो अलग रूप है

किन्तु हमारी अनुभूति तो एक ही है

कितना ग़लत सोचता था मैं

और लोग कितने सही थे

न तो यह इश्क़ ही था और न ही

यह उसका अक्समात्र था यह तो

बस एक कपट था छलावा था

जिसने दोनों को नही किसी एक वज़ह को

अपना आधार बना उसके प्रतिबिम्ब से

हमारे बीच के अद्रश्य रेखा को

अंकित कर हमें हमारे यथार्थ से कोसो दूर ले जाकर

धरती के मासूम सीने पर हमें ला पटका।

आचार्य अमित

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