#Kavita by Acharya Amit

शब्दों के लहज़े ज़रा

नरम करो बशर!

आस्तीनों में लोग

यहां ख़ंजर लिए हुए है

गिरते हुए शब्दों की

इतनी गरिमा खूब है

हर किसी दिल में

किसी का इश्क़ मंसूब है

बहते हुए नीर से

सीखो ज़रा बदलना

चलती हुई हवाएं अब

बदल रही है रुख अपना

नियत तो तुम्हारी

सादगी का आईना है

हर एक शख़्स तन्हा

और हर तन्हा दिल अपना है

आओ मियाद पूरी हम

कर ले इस दुनियादारी की

चन्द काग़ज़ी पैबन्द

जिसका खोखला सपना है….

आचार्य अमित

 

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