#Kavita by Acharya Amit

सुकूँ किस वक़्त किस

दर पर मिलेगा कौन जाने

जब मिलेगा तब मिलेगा

यहां सब अपने कंधों पर

अपनी लाश लिए फिरते है

बात अलहदा है मग़र सच है

हम अंधों के शहर में आईने बेच रहे है

धूंप में अपने साये को खो चुके

अंधेरो में उस अक़्स को खोज रहे है

तुम मैं मैं तुम इसी में सब उलझ रहे हो

बिगड़ी तो रब ही बनाता है

यहां तो सब बनी बनी के ठेकेदार है

रब का शुक्राना दिल तहेदिल से करता है

एक उसी के नूर ने ज़िंदा मुझको रखा है

बाकि तो सबने लुटा है मुझे सर से फ़लक़ तक

उल्फ़त की बागड़ोर उन्होंने सम्भाल ली

जिन्हें मालूम ही नही कि इश्क़ क्या बला है

क्या कहने तेरे दुनियाँ तेरा अंदाज़ ही ग़ज़ब है

यहां लोग जितने सादा दिखते है

भीतर से उससे कहीं ज़्यादा ग़ज़ब अज़ब है….

आचार्य अमित

 

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