#Kavita by Acharya Amit

तुम्हारा शहर मेरे गाँव से

आज भी बेहतर नही

और कल भी नही था

और आनेवाले कल में

भी नही होगा

शहर एक ज़हर है

जिसका ईलाज गांव के पास है

इस ज़हर ने सबकुछ तबाह

और बर्बाद कर दिया है

जाति-सम्प्रदाय भाषा और

मज़हब के नाम पर इसने

इंसानियत का क़त्ल किया है

लाखों दिलों को जो मासूम थे

इसने बहका कर उन्हें

पथभ्रस्ट किया है

इसके वज़ूद की बुनियाद

वो ईद और दीवाली है

जिसका पास कभी मुहब्बत

हुआ करती थी आज चन्द

काग़ज़ी टुकड़ों ने उस

मुहब्बत को हिन्दू और

मुसलमान कर दिया

दुनियां गवाह है जहां

ज़ज़्बात कुचले जाते है

वहां आत्मा मर जाती है

और जहां आत्मा मर जाती है

वहां लाश ही रह जाती है

और जहां लाशें दफनाई जाती है

उस जगह को श्मशान

(क़ब्रिस्तान) कहते है….

आचार्य अमित

 

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