#Kavita by Acharya Amit

लबों की नुमाइश ने

मेरे दिल की आज़माइश कर ली

शायद यही सोचकर सबने

हमसे अपनी राह बदल ली

दरकिनार कर दिया हमने भी

हर उस शख़्स को

जिसने मेरे इश्क़ की ज़ाविदा तस्वीर

अपने मज़बूर आँचल में धर ली

रोकता कौन है कोई किसी को

भला कैसे रोक सकता है

कोई किसी को किसी के चाहने से

अपनी चाहतों की बस्ती सबने

अपनी आंखों में रख ली

वो भी दर्दमंद है मैं भी रज़ामंद हुँ

तू मुझे पसंद है मैं तुझे पसन्द हूं

पसन्द-पसन्द की बानगी

सबने सनम की बाहों में धर ली

उस गली भी चल निकले

जिस गली देखा न जाना न था

उस डगर भी सज़दा किया

जिस डगर उसको आना न था

यास-ए-नामवर कहाँ से निकले ?

हमने आंखे उन ठिकानों पर रख ली….

अनदेखा वो यूँ करने लगे फिर

जैसे बात किसी की और

किसी और ने कानों पर रख ली

उनका यह अंदाज़ भी लुभाता है हमको

कुछ करे या करे फिर भी भाता है हमको

इसी अदायगी के धोखे में यारों

हमने तमाम ज़िन्दगी अपनी

मयखानों में रख ली

सोचा था वो कभी तो आएंगे

अपनी आंखों से मय पिलायेंगे

न वो भी आये और न आंखे उनकी

मयकश मयखानों में जाये और

सूखा लौट आये अभी तलक़ तो

यही बात सबको हम सी ही नागवार गुज़री…

आचार्य अमित

 

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