#Kavita by Acharya Amit

किसान…

 

किस की आन है वो जिसे कहते किसान है

किस आन का है वो जो

अपने को तपाकर पसीना बहाकर

अपना लहु जलाकर

खुद को आग में झुलसाकर

भुखमरी को अपनाकर

अपने मान को सम्मान देता हुआ

भोर में सूरज के उगने से भी पहले

खेतों में पहुंच जाता है कच्ची मुंडेर पर चलकर

चिड़ियों के भी जगने से पहले

बासी पेट पानी पीकर सबको अन्न देने वाला

वो किसान खुद अपने ही

बच्चों की भूख को निगल जाता है

मूक बधिर बनकर और वक्त की

निर्दयता को क़िस्मत का मज़ाक समझकर

स्वीकार कर खुद के ही जीवन को

अंतहीन बना लेने को आतुर हो उठता है

क्यों वो अनाज की पैदावार रोक देता

क्यों वो मतलबी और स्वार्थी नही बन जाता

वो क्यों लौटा देता वो सब जो उसने कमाया है

उन कमज़र्फ़ों को जिन्होंने उसके

जीवन मूल्यों को नष्ट कर उसे आत्महत्या करने के दोराहे पर लाकर खड़ा कर दिया है

वो क्यों नही उनसे अपनी बर्बादी का

ज़वाब तलब करता है वो क्यों पत्थर की

मूरत बना सबको बधिर की भांति निहार रहा है….

 

आचार्य अमित

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