#Kavita by Ajay Jaihari Kritiprad

मेरी नजरों में दुनिया की सारी माँ बहिनें मेरे लिए माँ समान है। इसे कोई व्यक्तिगत न ले ये आज की परिस्थितियों के अनुकूल रचना है। किसी को बुरा लगा होतो क्षमा प्रार्थी हूँ:-

—–आज की भाभीयाँ—-

कमर में कौसकर रखती है घर की सारी चाबियां

सास के उपर हावी होती आज की भाभीयाँ

ननद को घुसने नहीं देती अन्दर

बुआ को बाहर से भगाती हैं भाभीयाँ

गर कभी बुआ या ननद भूले भटके

आ जाये घर को

जैसे कोई आया हो पराया दर्शाती है भाभीयाँ

भैया को भड़काती मम्मी को नीचा दिखाती

कहीं तीज त्योहारों पर देना न पड़ जाये

इसलिए ननद बुआ को त्योहारों पर

घर नहीं बुलाती हैं भाभीयाँ

माँ बेटी को आपस मेंं लड़वाकर

खुशियाँ मनाती हैं भाभीयाँ

ऊँचा रखती है पल्लू सदा

बड़े बूढ़ों से भी नहीं शरमाती है भाभीयाँ

सास ससुर को मुँह पर सुनाकर

बुआ ननद को त्योहारों पर रुलाती है भाभीयाँ

कभी खिलखिलाती थी फूलों की भाँति

पर आज क्यों छोटी छोटी बातों पर

पीहर वालों को ससुराल बुलाकर

ससुराल को नर्क बनाती हैं भाभीयाँ

कलतक थी घर की चौकट अब उसे ही

लांग जाती है भाभीयाँ

कवि अजय जयहरि कीर्तिप्रद

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