#Kavita by Ajay Jain

दो पैरों पर आदमी
दौलत दंभ का शाह

नापन दुनियाँ चाहता
अंतस तृष्णा की दाह
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साँसों की है चाकरी
कर्मो की तनख्वाह

हस्ती जिंदा सोच की
सुख दुख दो ही राह

अजय जैन अविराम
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मन की मंजिल और है
मिली न मन की थाह

सुख दुख के व्यापार मे
साँसें थमती जायें
अजय जैन अविराम

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