#Kavita by Ajeet Singh Avdan

मक्कार-ए-आज़म

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दिल किसी का दुखाने से क्या फायदा

पूँछते हो अगर तो बता देते हैं

हो जहाँ पूँछ लटकी परेशान की

आग झट फुलझड़ी में छुआ देते हैं

 

देखते हैं जहाँ मामला ना-समझ

उस तरफ पाँव अपने बढ़ाते नही

बात ही बात में लात चलती जहाँ

बस वहीं कुछ हिलाते-डुलाते नहीं

सोचते हैं भला साथ क्या जाएगा

ज्ञान-गंगा में डुबकी लगा लेते हैं

हो जहाँ पूँछ लटकी परेशान की

आग झट फुलझड़ी में छुआ देते हैं

 

आस्तीनों में पलते सपोले हैं हम

टाँग पर इक खड़े भक्त-बगुला बनें

लोमड़ी की चुरा ली हैं मक्कारियाँ

चाल नहले पे अंदाज दहला चलें

ज्यों फटेहाल ढ़इया शनीचर कि हो

नाश का फिर नगाड़ा बजा देते हैं

हो जहाँ पूँछ लटकी परेशान की

आग झट फुलझड़ी में छुआ देते हैं

 

दूध में घुल चुके भाँग गोले से हम

चढ़ गए खोपड़ी पर उतरते नहीं

तुम समय पर हमें भाँप पावोगे क्या

हों जहाँ खामियाँ हम उभरते वहीं

आज अवदान नेता जहाँ बन गए

नर्क हर ज़िन्दगानी बना देते हैं

हो जहाँ पूँछ लटकी परेशान की

आग झट फुलझड़ी मे लगा देते हैं

 

अवदान शिवगढ़ी

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