#Kavita by Ajeet Singh Avdan

“नाम-रस”

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‘रस’ नाम अमिट जग में,प्रभु आप स्वयं धारे ।

संयोग प्रकृति होकर,नौ रुप हुए न्यारे ।।

 

संहार-सृजन-पालन

विस्तार ध्येय लेकर

सर्वत्र  तत्व  इक  है

संसार त्रिगुण देकर

 

भव-मुक्त सुचित हिय से,संशय दुविधा टारे ।

संयोग प्रकृति लेकर,नौ रूप हुए न्यारे ।।

 

शृंगार हास्य करुणा

अरु वीर अधीर करें

हैं रौद्र भयद बीभत्स

अद्भुत अधिवर्ग धरे

 

रसमयी नृत्यलीला,में मानव हैं सारे ।

संयोग प्रकृति होकर,नौ रूप हुए न्यारे ।।

 

दो नृत्य – भेद  क्रमश:

नित लास्य-ताण्डव हैं

रस  चार – प्रथम  दूजे

में   चारों    सम्भव   हैं

 

दोनों समरस रूपी,अन्तिम रसता द्वारे ।

संयोग प्रकृति होकर,नौ रूप हुए न्यारे ।।

 

अन्तिम रस दो रूपों

में साधन-साध्य बना

साधन प्रभु भक्ति लिए

रति का आरम्भ चुना

 

रस शान्त दास्य सखिता,वात्सल्य मधुरता रे ।

संयोग प्रकृति होकर,नौ रूप हुए न्यारे ।।

 

अवदान  शान्त रस  में

षट्सम्पति रति दासत्व

प्रगति  मधुर   रति   में

हो  परम  चरम  एकत्व

 

है यही दिव्य भगवत,सेवा सुख प्रतिभा रे ।

संयोग प्रकृति होकर,नौ रूप हुए न्यारे ।।

 

‘रस’ नाम अमिट जग में,प्रभु आप स्वयं धारे ।

संयोग प्रकृति होकर,नौ रूप हुए न्यारे ।।

 

…अवदान शिवगढ़ी

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