#Kavita by Ajeet Singh Avdan

किसके कारज का बनी, ये काया आधार ।

या बस बनके फिर रही, इस अवसर भी भार ।।

धरा पर अब तक राही ।।

 

घट-घट में रत खोजते, निज अनुकूल प्रमाण ।

प्राण-प्राण में भिन्नता,लाता कैसे प्राण ।।

प्रमाणित कब तक होगा ।।

 

सपनो के संसार की, बातों में क्या खास ।

पाया खोते पल रही, साँस-साँस नव आस ।।

यहीं सब छूटा जाए ।।

 

…अवदान शिवगढ़ी

 

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