#Kavita by Ajeet Singh Avdan

शराबी { नशा }

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पीनी पड़ी शराब जो, जिद पे आए आप ।

पैमाने से हो शुरू, बोतल का है माप ।।

 

आँखो की इन मस्तियों, को दारू में डाल ।

नशा बना बे-जोड़ वो, करते रहे कमाल ।।

 

मैं बेचारा पी गया, कितनी किसको होश ।

जब नाली में गिर पड़ा, हुए फ़ाख़्ता होश ।।

 

हाँथ पाँव मुँह टूट के, बे-दम हुई शरीर ।

पोर-पोर अब टूटता, हर हड्डी में पीर ।।

 

आते जाते रास्ते, लोग भिखारी जान ।

देते इक दो रूपया, बढ़ती उनकी शान ।।

 

शर्म नहीं आई मुझे, ऐसा मय का रोग ।

पड़े-पड़े हूँ सोचता, बना गज़ब संयोग ।।

 

कुछ पैसों से ठूँस ली, लेकर रोटी दाल ।

मधुशाला मैं फिर गया, होकर मालामाल ।।

 

देख हमारी दुर्दशा, मयखाने के लोग ।

लगे भगाने मार कर, सुरा मिली न भोग ।।

 

कंचन काया कामिनी, शाकी बोली बैन ।

पागल भी पाते नहीं, बिन दारू के चैन ।।

 

मात पिता पत्नी सभी, बच्चे घर परिवार ।

दुखी हुए असहाय हैं, जिसका मैं आधार ।।

 

सब समाज में कोसते, खत्म हुआ सम्मान ।

जीवन से हारा हुआ, भटक रहा अवदान ।।

 

…अवदान शिवगढ़ी

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