#Kavita by Ajeet Singh Avdan

स्मृति-भान

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सब को श्रीमन्नारायण जी,

श्रीमन्नारायण सबको जी ।

वर्तमान में स्मृतियों के,

विस्मृत नाम न हों अब तो जी ।।

नाम-स्मरण ध्येय हेतु यह,

सृजित-छंद स्वीकार करो जी ।

धर्म-सनातन पालन-रक्षण,

परम्परा निज वहन करो जी ।।

 

 

अत्रिस्मृति औसनस्मृति व,

आश्वलायनस्मृति भी पढ़ो जी ।

आपस्तम्ब आंगिरसस्मृति,

कपिल कण्व के दम्भ भरो जी ।।

चिन्हित हों कामादि दोष सब,

भिन्नाशक्ति विकार हरो जी ।

मानव जीवन में मानवता,

रिक्त-पूर्ति अब पूर्ण करो जी ।

 

 

पाठन-पठन जहाँ तक सम्भव,

व्यापक-चिन्तन सम्भव हो जी ।

विस्तृत-व्याख्या के अनुपालन,

का संचालन फिर नव हो जी ।।

कात्यायन गौतमस्मृति,

दाल्भ्य दक्षस्मृति दुर्लभ जी ।

नारदीयमनु पाराशर का,

स्मृति ज्ञान सुलभ अब हो जी ।।

 

 

प्रजापतिस्मृति बौधायनस्मृति,

बृहत्पराशर जी की स्मृति ।

बृहद्यम जी बृहस्पतिस्मृति,

भारद्वाज व मनु की स्मृति ।।

मार्कण्डेयम् याज्ञवल्क्यम्,

यमस्मृति लघुव्यासम्स्मृति ।

लिखितस्मृति लघुहरितस्मृति,

लौगाक्षि नीति लघुशंखस्मृति ।।

 

 

लघुस्मृति लघ्वाश्वस्वलायनम्,

व्यासस्मृति विश्वामित्रस्मृति ।

वशिष्ठस्मृति वाधूलस्मृति व,

विष्णु वृद्धशातातपस्मृति ।।

व्याघ्रपाद व वृद्धगौतमम्,

शंखस्मृति शांडिल्यम्स्मृति ।

शंखलिखित संवर्तस्मृति,

अवदान पढ़ें हारीतस्मृति ।।

 

…अवदान शिवगढ़ी

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