#Kavita by Ajeet Singh Avdan

श्रीगुरु

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श्रीगुरू मिलन सुप्रेरणा, हरि-प्रेरित भव जान ।

तेहिं क्षण साधक साध ले, चितवनि कृपा निधान ।।

 

डूबत जल अति-लालसा, प्राण-वायु की चाह ।

ऐसी लगन लगाइए, सुलभ आप गुरु राह ।।

 

भूचर जलचर गगन चर, वृक्ष पवन अरु तोय ।

अग्नि जलद पाषाण भज, जहाँ आस्था होय ।

 

अति दुर्लभ इस लोक में, अखिल-भुवन के सार ।

सकल जीव-धारी भजें, गुरु पद अपरम्पार ।।

 

बंधु मातु पितु या सखा, परखु मनुज की देह ।

गुरू ज्ञान-भंडार हैं, हरत सकल संदेह ।।

 

कहीं नहीं संसार में, गुरु आश्रय सम ओंट ।

पञ्च-दोष मन मार के, दूर करें सब खोट ।।

 

गुरु-दर्शन सौभाग्य से, चरण धुले अवदान ।

ले आचमन प्रसाद का, कर चरणामृत पान ।।

 

अवदान शिवगढ़ी

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