#Kavita by Akash Khangar

ताबीज न कुछ कर पाया

न दुआ ही रंग लायी

जब चली गलतफेहमियो की हवा

मेरा घर तबाह कर आयी

 

कितने सपने संजोये थे

कितने मढ़के पिरोये थे

एक पल में बिखर गया सब

जो वक़्त ने ली अंगड़ाई

 

खुशबुओं का सौदागर था वो

कलमे गुलाब की लगाता था

पत्ता पत्ता झड़ गया जब

रुत पतझड़ की आयी

 

आज यकायक ही धड़क गयी धड़कन

अचानक ही सिहर उठा मेरा मन

ये यूँ ही नही हुआ

बस याद तेरी चली आयी

 

ताबीज न कुछ कर पाया

न दुआ ही रंग लायी…आकाश खंगार

 

 

 

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