#Kavita by Alka Jain

डिग्री लेलेगे नोकरी लग जायेगी

डिग्री मगर बोझ बन जायेगी

किसने सोचा था किसने जाना था

आशिकी करेंगे आशियाना बन जायेगा

आशिकी मगर बर्बादी लायेगी

किसने सोचा था किसने सोचा था

जायदाद है ग़रीबी केसे सतायेगी

जायदाद मगर फसाद करवायेगी

किसने सोचा था किसने जाना था

बुआई कर ली अब फसल कटेंगे

फसल मगर लुट जायेगी

किसने सोचा था किसने जाना था

जवान है जश्न मनाने के दिन

जवानी मगर खजाने भरने में कट जायेगी

किसने सोचा था किसने जाना था

खजाने है अब बहार आ गई समझो

मगर उमर बीमारी ला रही है

किसने सोचा था किसने जाना था

औलाद बड़ी हो गई आराम देगी

औलाद मगर अलग  घर  बसा लेगी

किसने सोचा था किसने जाना था

हुनरमंद है गम काहे पाले

हुनर मगर बाजार में चल नहीं सकेगा

किसने सोचा था किसने जाना था

मझधार में साथ रहे यारो के

फिर भी हम बेसहारा हो जायेंगे

किसने सोचा था किसने जाना था

मर्ज है हकीम ठीक कर गुजरेगा

हकीम बुढापे में निकम्मा निकला यारो

किसने सोचा था किसने जाना था

अभी बहार बाकी थी मेरे हिस्से की यारों

मोत द्वारा खडी मेरा

यूं मेरी  दास्तां होगी अपनी

किसने सोचा था किसने जाना था

 

164 Total Views 3 Views Today

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *