#Kavita by Alka Jain

पेट रोटी मांगता रहा जिस्म पसीना बहाता रहा
हर मुफलिस यही एक कहानी दौस्त
उम्र तो खेलने कूदने की थी बचपन था
पेट की आग मगर काम करवाती रही
पराई औलाद पर किसी को दया नहीं आती
काम बहुत ओर टका कम देता रहा साहूकार
आइना देखने का वक्त ना मिला
खूबसूरती बेमिसाल खुदा ने हमें भी दी
साजन की बाहों में हम झुलना चाहते रहे
मगर जवानी पेट की आग बुझाने
मैं गुजरी
रकम इतनी थी पेट भरे या बदन ढंके
अधढके बदन पे जमाने की बुरी नजर रही
सपने तो सुहाने मुफलिस ने भी देखें
हकीकत की आग जलाती रही सपने
चिल्लर मेरै हिस्से की भी दुनिया दबा रही है बाबू
न्याय मिलेगा कब गरीब को साहब
मोत सामने खड़ी नजर अब तो आती है
पेट रोटी मांगता रहा जिस्म पसीना बहाता रहा
नेता की तरक्की तेजी से हो रही
गरीब जनता रोटी की जुगाड में लगी

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