#Kavita by Alok Shrivas

कश्मीर में सेना का अपमान करने वालों की भर्त्सना करती मेरी कविता ।

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बस यही रह गया है बाकी , घुसें , लातें  खाने  को।

शर्म नहीं बचा है तुममे, और क्या रहा दिखाने को।।

 

 

जिस सेना ने जाँ पे खेल, खतरों से तुझे बचाया है।

उस सेना के जज़्बातों को, तूने  ठेस  पहुँचाया  है ।।

 

 

लोकतंत्र ने संविधान की, पहलु में मुँह छिपाई है।

धारा तीन सौ सत्तर की , देखो  कैसीे भरपाई  है।।

 

 

अब ये कैसा  प्रजातंत्र  है , काश्मीर  की घाटी में ।

संविधान को धूल चटा दी, इस पाहन परिपाटी ने ।।

 

 

मानवाधिकार के दल्लों, अब तुमको क्या होश नहीं।

दहशतगर्दों में तुमको, अब दिखता है क्या दोष नहीं।।

 

 

पेलेट गन के ऊपर तूने , हो-हल्ला खूब मचाया है।

फूट गई क्या आँखे तेरी, इसको  देख  न  पाया है ।।

 

 

पत्थरबाजों का साहस तो, तूने  खूब  बढ़ाया  है।

सेना के अपमानों पे क्या , तूने  रोष  जताया  है।।

 

 

क्यों देश की ये संसद , चुपचाप मौन सी बैठी है।

उनकी ही शह पे देखो , यह दहशतगर्दी  ऐंठी है।।

 

 

धैर्य और संयम की देखो , सेना बनी  मिसाल है।

छेड़ो न सोये नागों को, जागे तो समझो काल है।।

 

 

जो सैनिक पे हाथ उठाये, हाथ वो तोड़ा जायेगा।

जेहादी को घुस के उनके , घर में फोड़ा  जायेगा ।।

 

 

सियासत के हाथों गर उनकी, हाथें बंधी नहीं होती।

तो लाल चौक के  चौराहे पर, लाशें तेरी टँगी होती।।

 

 

जिस दिन भी सेना को , अधिकार ये मिल जायेगा।

उस दिन इन संगीनों पे , तू खुद को लटका पायेगा।।

 

 

~ आलोक श्रीवास “आलोक” ~

 

 

 

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