#Kavita by Amit Acharya

यह तेवर भी कहाँ अपने है
किराये पर लाये है उधार मांगकर
उन्माद और उम्मीद दोनों ही अपने नही
सपने जो देखे वो सपने भी सपने नही
जाने क्या हो गया है अब
ऐतबार का सिलसिला साहिब!
जिधर से भी गुज़रते है
अंजान सी लगती है रहगुज़र
कुछ अपना नही कुछ सपना नही
जो जँचता है वो भी अपना नही
अधूरा ज्ञान किसी का उलझा गया है
कोई अपना कहकर भुला सा गया है
अब जाने कब वो लौटकर आएगा
आया तो ठीक वरना यह दिल
उसका याद तक भूल जाएगा….

आचार्य अमित

Leave a Reply

Your email address will not be published.