#Pratiyogita Kavita by Anand Shinghanpuri

हे कलियुगी मानव!!
रावण जला क्या बताना चाहते हो।
जो हर वर्ष बड़े हर्ष
के साथ जलाते हो।।
उनके जलने से
क्या परिवर्तन मिलता हैं।
धरती पर उनसे बढ़ घातक फलता फूलता हैं।।
जो समाज को निगलना चाहता हैं।
रावण से बढ़कर अमानव विचरता हैं।।
हे कलियुगी मानव!!
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जन मुख में राम बसा लुटा करते हैं।
हम अबूझ ना जाने
कहा राम ढूंढा करते हैं।।
जिनके कसम खा जग पाप के भागी बनते।
पता नही पुण्य की
कठरिया ले कहा घूमते।।
रावण से बढ़ जग में गुणों का गान करते हैं।
कही राम रहीम,आशा,रामपाल रसपान करते हैं।।
इंसा इंसा को देख पूजा करते हैं।
कलियुगी राम का नाम ले रावण का वेश धरते है।
हे कलियुगी मानव!!
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राममय इस धरा पे पुण्य अनेक हैं।
कर्तव्यपरायाण , विश्वास नेक हैं।।
पर दुष्कर्म करते अथकंडे बाबाये।
पूण्य सलिला की धरा पर धुनि रमाये।।
जो सिद्ध तत्व के भागी बने।
उनको अधर्मी उनके नाम ले तने।।
क्या रावण जला हम जीवित अधर्मी विनाश कर पाए।
नित मानवता का थाप धर आये।।
मैं खण्डन करता हु
रावण की पुतले दहन को।
जलाओ अपने मन की अहम को।
साधो अपने तन को।
जागृत करो नित वन्दन।
महके धरती बन चन्दन।।
नित गाये प्रभु का भजन।
रम जाए तन मन।।
ऐसे हो परमात्म तत्व पर आस्था का सार।
रावण की मिशाल देना
छोड़ दो संसार।।
हे कलियुगी मानव!!
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राग द्वेष मानव मानव में पनपते हैं।
निज बैर की भावना
पड़ोस में भी विचरते हैं।।
जिनको मिटाने पूरा अस्तित्व चल देता हैं।
चाहे कितने भी बलशाली प्राण फुकता हैं।।
आज सभ्य धरती भी
देख पुकारती होगी।
मुझे पूर्व भांति राममय धरा दिला दो।।
हे कलियुगी मानव!!!
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कवि आनन्द सिंघनपुरी
युवा साहित्यकार
छत्तीसगढ़
विजयादशमी पर प्रमुख रूप से रचित रचना।

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