#Kavita by Anand Singhanpuri

जननी तेरे चरणों की धूलि,

माथों में  ले करता सदैव वन्दन |

पग- पग पे पुष्प बिखेरू,

करता सप्रेम सादर अभिनन्दन |

तेरी ममता की दामन ले ,

कर लूँ कुछ क्षण के लिए शयन |

लोरी सुना दे मंद- मंद मुस्कान से,

सो जाये मेरे मतवारे कारे नयन |

तेरे करुण हृदय की वो मधुर स्पंदन|

ले पसार हाथों से अपनी,

रुदन भरे नेत्र को करती निमीलन |

मन मंदिर की पावन द्वार से ,

झांक करता आत्म मंथन |

तेरी  ममता के आगे, हे माँ !

करता ये लाल आत्म समर्पण |

“दुखों का सागर”

माँ! दुखों का सागर देखा नहीं जाता,

इस देह का पीड़ा सहा नहीं जाता |

माँ ! तू मेरी जन्मदात्री,

तूने अबला का वचन निभाया

दुखों को तूने घूट- घूटकर पीया

वो हमसे अब पीया नहीं जाता |

माँ! दुखों का सागर देखा नहीं जाता,

इस देह का पीड़ा सहा नहीं जाता |

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