#Kavita by Anand Singhanpuri

अंगारों में जलकर,

तू कंचन जैसी नित चमकती रही|

अपने लाल को सींचती रही,

ममता की डोर में निशदिन पिरोती रही |

आज भी अपने लाल के प्रति प्रेम कम ना हुआ,

तुझको धुत्कार कर मेरा गम कम ना हुआ |

जिस थाल में रोटी के निवाले खिलाये

उन हाथों को सहारा,

वो रोटी का निवाला

क्यूँ हमसे खिलाया नही जाता,

माँ! दुखों का सागर देखा नहीं जाता,

इस देह का पीड़ा सहा नहीं जाता |

अपने कोमल हाथों से,

तूने अमृतपान कराए

मंद –मंद मुस्कान,

लोरियों की मधुर तान

दे हमको गोद में सुलाए |

वही हाथों से पला ,

तुझे दर – दर वेदना दे

कचौटती अन्तस् अब थामा नही जाता |

माँ! दुखों का सागर देखा नहीं जाता,

इस देह का पीड़ा सहा नहीं जाता |

बालपन में जब

ठुमक – ठुमक कर आया करता

नृपुर की आवाज सुन

जब तेरे सन्निकट जाया करता |

तुम मुझे गले लगा

अपने अन्तस् में जगह देती

अब तुम्हे अपने साथ रखने

मेरा दिल क्यों कतराता |

हे माँ !

तेरा कर्ज का सदैव ऋणी रहा

अब तेरे ऋण चुकाया नही जाता |

माँ! दुखों का सागर देखा नहीं जाता,

इस देह का पीड़ा सहा नहीं जाता |

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