#Kavita By Anand Singhpuri

बसन्त गीत

हौले, हौले रे घुमड़ बासन्ती पवन,
लेकर अहसासों का मीठा छुअन।
मस्ती भरी अंगड़ाई, कलियां भी देख देख मुस्काई।
झूम उठे भौरें ऊंचे गगन।।

शमाँ देख कर बदला है करवट,
माथे पर हैं सिकन की सलवट।
जुबां पर घुल रहे हैं गीत मल्हार
खिल रहें है दिलों पे हंसी का गुब्बार
झूम उठे हैं हो मगन।।

अमरईय्या बौराये खिलखिलाये पलाश,
पँछी चहचहाये,करते तलाश
पसार बाह सरसों बुलाये अपने पास
चहके पतछड़ पाकर मधुमास
पल्लवित विटप बना मधुबन।।

नव किसलय लगा है डाल-डाल
गूँथते गीतों की स्वर लहरी माल।
रसिकों के दिल में भरता बहार
धरा भी आतुर करने अँकवार।
सजते सरगम,रमते मन।

कवि आनन्द सिंघनपुरी
युवा साहित्यकार
रायगढ़।

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