#Kavita by Anantram Chaubey

दुखियारी

फटे पुराने कपड़ो
में ठंड से सिकुड़ती
एक सुन्दर काया
अपने अरमानो से
मन ही मन लड़ रही थी ।
तन की खूबसूरती
छुपाने में असमर्थ
किस तरह वह अपनी
जिन्दगी जी रही थी ।
अपनी पूर्व योनी को
यादकर अपने पर
मन ही मन रो रही थी ।
आत्म निर्भर बनने
तवायफ घर से निकलकर
बचपन तो गुजार दिया
अब जवानी पर रो रही थी ।
उस घर में तो पेशा ही था
यहाँ के तो  हर घर में भी
वही कहानी जीने को
मजबूर कर रही थी ।
अपने यौवन को वचाने
असहाय आसमर्थ हो रही थी ।
हे भगवान तेरे ही दर पर
ये फुटपाथ की दुखियारी
अपने मोक्ष को पाने
आपसे विनय कर रही थी ।
अनन्तराम चौबे
अनन्त
जबलपुर म प़
9770499027

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