#Kavita by Anantram Chaubey

बाबूल के घर आँगन में

बाबूल के घर आँगन में
एक सुन्दर फूल खिला है ।
खुशियाँ घर के आँगन में हैं
हर चेहरा खिला खिला है ।
फूल खिला है जो आँगन में
वो फूल सी सुन्दर बेटी है ।
पहली बार वो माँ बनी है
जो बचपन से माँ की बेटी है ।
माँ न हो तो बेटा बेटी का
जन्म नही हो सकता है ।
माँ की कोख में हर बच्चा
सही सुरक्षित रहता है ।
बेटा है कि बेटी है माँ
अपनी संतान समझती है ।
अपने से ज्यादा उस बच्चे का
ख्याल सदा माँ रखती है ।
बाबूल के घर आँगन में
जब बेटी पैदा होती है ।
माता पिता का घर अपना
बचपन से बेटी का होता है।
शादी के वाद पति का घर भी
उस बेटी का घर भी होता है ।
बेटी की जगह बहू बनती है
दो कुल की लाज निभाती है
मर्यादा में रह करके भी
अपना धर्म कर्म निभाती है ।
बेटे से बढ़कर हर बेटी ही
अपना ही धर्म निभाती है ।
माता पिता सास ससुर के
दुख और दर्द समझती है ।
बाबूल के घर आगन में
जब बेटी पैदा  होती है।
दो कुल की मर्यादाओं में
अपना सारा जीवन जीती है ।
अनन्तराम चौबे

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