#Kavita by Anantram Chaubey

ठंडी आई

ठंडी आई ठंडी आई
धूप सभी के मन को भाई
खेतों में पानी पानी था
अब फसल वहाँ लहलहाई ।
खेतों में फसलें ऊग आई
चारों तरफ हरियाली छाई ।
हरी हरी फसल देखकर
किसान के मन में खुशियां छाईं ।
बच्चे बूढे सभी, ठंड से कांपते
लकड़ी के अलाव नही अब जलते
सुबह शाम  ठंड है लगती
धूप बिना ये ठंड न भगती ।
दिन में ठंड से धूप में सिकते
शाम को अपना बिस्तर पकड़ते ।
रजाई मिले नहीं ओढ़ने
तब है समझो लफड़ा ।
बिस्तर में ही रखी किताबें
बच्चे करते है पढ़ाई
कितने भी कपड़े पहनो
पर ठंड भगे न भाई ।
आजू बाजू से ठंडी हवाये
सबको बहुत सताती है ।
स्वेटर पहनों मफलर बांधो
फिर भी ठंड सताती है ।
साजन बिन सजनी को भी
बिस्तर में नींद न आये ।
कैसे कटें अकेली रातें
ये ठंडी बहुत ही सताये ।
ठंड़ी आई ठंड़ी आई
साजन की ये खबर न लाई
ठंडी बहुत सताती है
रातें कटती न ओढे रजाई ।
ठंडी बहुत है भाई
ठडी आई ठंडी आई ।
अनन्तराम चौबे

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