#Kavita by Anantram Chaubey

कल्पना से परे

 

कवि कल्पना

से परे होता है  ।

कल्पनाओ मे

जब खोता है ।

कवि अपनी कल्पना

से किसी को भी कही

भी पहुचा देता है  ।

आसमान के तारो को

झोली मे भर देता है ।

चाँद से बात करता है

किसी को चाँद किसी

को चाँदनी बना देता है ।

तारो को फूलो की तरह

माला मे पिरो देता है ।

कवि का मन कभी

पर्वतो की वादियों मे

विचरित करता है ।

कभी समुद्र मे गोते

लगाकर तैरता है ।

झरनो की कल कल

ध्वनि को वीणा की

तरंगो मे  सजाता है ।

कवि की कल्पना ही है

जो सागर को गाघर मे

कल्पना से भर देता है

कल्पना से परे कवि

ही कुछ लिखता है ।

कल्पना करना

सपने देखना

सपने सजाना यह

तो हर कोई करता है ।

सपने तो सपने है

मन मे कल्पना करो

सपने दिख जाते है

कल्पना से बाहर निकलो

सब सपने विखर जाते है ।

कवि ही है जो कल्पनाओ

से शव्दो को जोड़ता  है ।

मंजिल पाने रास्ते को

भी मोड़ देता है ।

सजाता है सवारता है

एक कविता का रूप देता है ।

कल्पना से परे लिखता है ।

किसी के भी सपने सजाता है ।

कवि की कल्पनाओ का

पिटारा हमेशा भरा होता है ।

कल्पना से परे जो होता है ।

अनन्तराम चौबे

* अनन्त *

जबलपुर म प्र

 

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