#Kavita by Anil Uphar

सामाजिक रिश्तों की

आद्रता में

भीगता हृदय,

सम्मोहन की छांव से

बन जाता है

आस्था का तीर्थ ।

 

बौखलाते प्रश्न चिन्ह

और गलबहियाँ करती

अनागत की अंतहीन

प्रतीक्षा

प्रेयसी के हिय की

तुलसी को

जल चढ़ाता

निश्छल मन

नापना चाहता है

समर्पण की गहराई ।

और तुम हो कि,

चाहते हो

फिर से

खो जाना

विरह के कुहासे में ।।।।।।  –  अनिल जैन उपहार

 

 

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