#Kavita by Anil Uphar

मलयानिल की मन्द समीर

जब छूकर गुज़रती है

उसके अहसास को

तो मन

एक अज़ीब सी गंध से

महक उठता है ।

रूप और लावण्य

गूँथ देते है उसकी विनम्रता को

अभिमंत्रित माल में

रिश्तों को सहेजने का हुनर

बखूबी आता है उसे

तभी तो मन उसके प्रति

भर जाता है अटूट श्रद्धा से ।

सारे गीत और छंद

अर्घ बन चढ़ जाते है उसके चरणों में

श्रद्धा की ओ पावन प्रतिमा

तुम्हे व्याकरणी पैमाने

नाप नही सकते ।

शब्द शब्द निखर उठते है

पा तुम्हारा सानिध्य ।

कविता रच देती है

सम्बन्धो का नया दिनमान ।

 

अनिल उपहार

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