#Kavita by Archana Khochar

पिता को समर्पित

दर्द का अहसास

बचपन की गोटियाँ
संग यार लगोटिया
मस्ती में इतराना
पिताजी का कान्धे पर झुलाना।

मेरा रुठना
उनका मनाना
खेल-खिलौने दिलवाना
चाट-पकौड़ी खिलाना।

माँ का दुलार
पिताजी का प्यार
न जाने कब
जवानी से इुई आँखें चार।

शुरु हुए मेरे ताने
मेरे उलाहने
उनका मेरे आगे झुकना
फिर-फिर मुझे मनाना।

पिताजी की बढ़ती उम्र
झुकती कमर
उम्र का पड़ाव
मेरे प्यार में उनका झुकाव।

मुझे दिखता नहीं था
या मैं जानबूझ कर अनज़ान बना हुआ था
मेरा नित्य क्रोध में उबलना
उनका सहज भाव में सुनना।

मेरा बेखबर रहना
उनका आशीषों में हाथ उठना आम था
सुबह से शाम तक उनकी जुबां पर
एक ही नाम मेरा प्यारा शाम था।

उनके अक्स से ही मेरा वजूद है
इस दर्द को मैं कभी महसूस नहीं कर पाया
उनके दर्द का आज मुझे हुआ अहसास
जब मेरे वजूद ने इस धरा पर लिया साँस।

अर्चना कोचर

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