#Kavita by Archana Kochar

कितनी दूर चले गए भगवान है

 

मिलते दिल, डोलते ईमान हैं

मानवता, मानवता की गुलाम हैं।

 

छल कपट को, वहीं देते अंजाम है

जो बन कर जान, बनते अंजान हैं ।

 

बेइज्जत, इज्जत की देते दुहाई हैं

इज्जत बचाने में, होती इज्जत नीलाम हैं।

 

लब पे चाशनी, सारी रफ़ाक़त बेईमान है

सिर्फ दो टके में, बिकता आदमी का ईमान हैं।

 

इंसान, इंसान को सलाम करता हैं

निज स्वार्थ में, कत्ले सरेआम करता हैं।

 

अपने बेचते हैं अपनों को, इसी धरा पर

कितनी दूर चले गए भगवान है।

 

मय्यत रवाना हो जाते हैं मुर्दें, कफ़न के इंतजार में

बिक जाते हैं कफ़न, पैसे के इंतजाम में।

 

अर्चना कोचर

Leave a Reply

Your email address will not be published.