#Kavita by Arti Alok Verma

मौसम बरपा गया कहर
अब जिंदगी  गई ठहर
ये जीवन कैसे हो बसर ?
कड़ी धूप ने रोजी छीनी
बारिश ने तोड़े छाजन
करने को जीवन यापन
परदेश जा रे तू साजन ।।
महंगाई में  ने तोड़े कमर
चूल्हे  ठंडे पड़े घर -घर
नीत जीवन देखें मर मर
देखें बूढे मां-बाप  या
देखेंअपना बचवन
करने को जीवन यापन
परदेस जा रे तू साजन।।
सूखा राहत का नहर
तोड़ तोड़ कर पत्थर
भोजन न मिलता पेट भर
धूप से झुलसी जवानी
भूख से ऐंठा बचपन
करने को जीवनयापन
परदेश जा तू साजन ।।
विफल जन वितरण
ना कूपन, ना  राशन
विपदा की घड़ी में भी
ना डिबियाभर किरासन
कही बाढ का डर
कहीं सूखे का कहर
जी तोड़ मेहनत कर भी
दो  रोटी ना मयस्सर ,
बच्चे खेल में मगन
नाम के स्कूल का
नहीं है भवन ,
ना पठन-पाठन
ना पोषण – भरण
करने को जीवन यापन
परदेस जा तू साजन ।।
आरती आलोक वर्मा,नीलू

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