#Kavita by Arun Kumar Arya

ख़ूनी पञ्जे

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दुनिया विचित्र,विचित्र है इसमें लोग

कोई भूखा सोए,कोई भोगे राजभोग

सब एक जैसे हैं,सब उसकी सन्तान

कोई माने ना ,कोई कहता भगवान।

 

बना डाले सबने अपना अपना ईश्वर

जाति धर्म पर बँट गया उसका फरमान

इंसानियत का उठ गया यहाँ जनाजा

रह कहाँ गया अब धरती पर इंसान।

 

मजहबी चोंगें में बना मजहबी सूरत

मूक स्वर में बोले परिचय की बोली

छिन गया जग से इंसान का दर्जा

खेल रहें अब यहाँ सब खून की होली।

 

लिबास सबके दिखते अलग अलग

सिर से पाँव तक ढँका दिखता चोला

किसी को तन ढकना ही नहीं सुहाता

नट बन कोई घूमे,कोई दिखता भोला

 

कैसे कहूँ ईश्वर एक है सब उसके बन्दे

मजहब कीआड़ में खेल खेल रहें गन्दे

कमाने का बना बैठे इसे अच्छे धंधे

शूली चढ़ा मानव डाल के मजहबी फंदे

 

खेल बना रखे हैं मजहब को बन्दे

बन बैठे यहाँ सब धर्म के ठीकेदार

कितने भर रहें बिना कर्म किये झोली

होगा इससे अच्छा कौन सा व्यापार।

 

धर्म बना है सुख शान्ति के लिए

मांस नोच रहे धर्म के ख़ूनी पञ्जे

कहीं चिथड़े शरीर, कहीं विखरे खून

कहीं गोलियाँ,चल रहे कहीं तमन्चे।

 

ढहेंगी कब मजहब की बेडोल दीवारें

कब मानवता के पुष्प यहाँ  खिलेंगे

आर्य ” आकाओं को बैठा एक स्थल

पूछो मानवता का कब ये पाठ पढ़ेंगे।

 

अरुण कुमार “आर्य”

प्रधान, आर्य समाज मन्दिर मुग़ल सराय,चन्दौली।

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