#Kavita by Arun Kumar Arya

माता च पिता

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माता बड़ी है या पिता बड़े हैं

हमको नहीं  इसका उचित ज्ञान

मातृ देवो भव व पितृ देवो भव

शास्त्र सम्मत है हमारे संज्ञान।

 

दोनों मिल रचना करते जीव का

जग के सब जीव उसकी संतान

देवता कहते जब हम उन दोनों को

छोटे बड़े का फिर कैसे करे पहचान।

 

संस्कारित करती माँ बच्चों का

पिता करता उन सबकी  सुरक्षा

दोनों का है महत्व अपना अपना

कैसे करेंगें हम उनकी समीक्षा।

 

माँ भोजन देती है हम  लोगों को

पिता करते हैं उसकी व्यवस्था

परिपूरक होते दोनों एक दूसरे के

किसको सुनाऊँ हम उनकी व्यथा।

 

नौ माह पालती माँ गर्भ में बच्चे को

पिता करता उसकी सेवा सुश्रुषा

आता जग में जब नन्हा मुन्ना बच्चा

साथ रहने की होती है जिजीविषा।

 

हृदय कहलाती माँ अपने बच्चों की

पिता है जो बुद्धि का स्थान पाता

श्रद्धा,ज्ञान का अपना अपना महत्व

अटूट है दोनों का मानव  से नाता

 

माँ धरती समान होती है विशाल

पिता आकाश से ऊँचा कहलाता

कैसे कहें किसकी कितनी महत्ता

आता नहीं समझ में हमें विधाता।

 

माँ को कहते सब लोग ही महान

पति को मानती है अपना भगवान

जिसकी पूजा करती निशि दिन वह

कैसे पिता को छोटा कहे यह नादान।

 

एक दूजे बिन जीवन उनकी अधूरी

दोनों हैं वे एक दूसरे के परि पूरक

कैसे कहे माँ बड़ी है या पिता बड़े

मौन है यह अपने को समझ मूरख

 

माता पिता दोनों पूज्य हम सब के

पूज्य भगवान समान सदा होता

आर्य” किसे कहे छोटा है या बड़ा

धन्य वह जो इन्हें हृदय में सँजोता।

 

अरुण कुमार ‘आर्य’

पंडित दीनदयाल उपाध्याय नगर

मुग़ल सराय चन्दौली।

 

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