#Kavita by Arun Kumar Arya

प्रकृति का सन्देश ******

 

प्रकृति के आँचल में बढ़ी मानव कृति

प्रकृति ही है जीव, जगत का निर्माता

क्षिति, जल, पावक, गगन और समीर

पंचतत्व प्रकृति कण कण के विधाता

 

धरती माँ के गोद में खेले सब प्राणी

धीरज का हमें जो वह पाठ पढ़ाती

मुस्कानें सिखाता चन्द्रमा चमककर

सूर्य की किरणें जीवन गाथा बताती।

 

मर्मर गीत सुनाता पेड़ों से मिल वायु

बादल परस्पर मिल  पानी बरसाते

पेड़ों की डाल झुक प्रेम से जीवों को

मीठे मीठे क्या रसीले फल खिलाते।

 

नयन उलझते सागर की देख लहरें

तट पर नारियल मीठे पानी पिलाता

देखो उठ गिर कहती ये उत्ताल तरंगे

जग के कोने कोने में मैं धाक जमाता

 

पहाड़ें भी तो कुछ कहते  हम सबसे

मेखला बन पृथ्वी का मैं करता श्रृंगार

कल कल गाती हुई नदियाँ निशि दिन

करती रहती हैं इस जगती का उद्धार

 

रंग रंग के पुष्प, विखेर मधुर सुगन्ध

हँस वह अपना यश फैलाने को बताता

कोयले की काली खानें भी कहते हमसे

काला कोयला हो हीरों को मैं चमकाता

 

सागर के अन्त: में विखरे मूँगा मोती

डूब उसे व्यक्ति जो ढूँढ़कर ले आता

लक्ष्मी की गोद में बैठकर मानव वह

सिंहासन पर बैठ ख़ुशियाँ खूब मनाता

 

प्रकृति का कण कण गुरु हम सबका

हर विधि हमें वह ज्ञान का पाठ पढ़ाता

आर्य” जगत सीखे ऐसे इन गुरुओं से

मूर्ख को इस जग-ज्ञान से है क्या नाता

 

अरुण कुमार आर्य

मुग़ल सराय चन्दौली

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