#Kavita by Arun Kumar Arya

वैश्विक हिन्दी साहित्य का स्वरुप

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साहित्य है चिन्तन साहित्यकार का

साक्षात शब्दों की कड़ियाँ जुड़ होता

हिन्दी है संस्कृत की अपनी प्रिय पुत्री

प्रिय उतना जितना उसमें गुण होता।

 

तत्सम, तद्भव इसमें खूब मिलता

तत्सम संस्कृतनिष्ठ प्राय: कहलाता

तद्भव प्राय: वहाँ आकर धाक जमाता

संस्कृत से जिसका नहीं रहता नाता।

 

प्रवासी साथ ले गये भाषा बोली निज

बोलते स्वजनों से प्राय: अपनी बोली

मातृभाषा की मोह नहीं छूटी उनसे

बोलते जम जहाँ रहती उनकी टोली।

 

सँजोए रखे हैं धार्मिक पुस्तकें अपनी

धर्म में है उनका वहाँ भी पूर्ण विश्वास

एक दिन परस्पर मिलेंगे अपनों से हम

रहती सदा उनके हृदय में पूरी आस

 

रखते व्याकरण का ध्यान प्रवासी भी

बोलने में उनके कुछ त्रुटियाँ मिलती

जैसा उच्चारण करता व्यक्ति कोई

शब्द पटल पर वैसी आकृति दिखती

 

पर्यावरण का प्रभाव बोली में मिलता

चार छ: कोस पर बदल जाती बोली

हम भी तो लिखने बोलने के आदती

स्वत: करते संग अपने खूब ठिठोली

 

कुछ तो है वहाँ भी बहुत ज्ञानी जन

संत, साहित्यों से सीखे अनुपम ज्ञान

पढ़-लिख भये ज्ञाता विद्वान जब वे

उत्सुकता में बढ़े देने को ज्ञान- विज्ञान

 

ज्ञानी की भाषा होता ज्ञानी जैसा

रहे चाहे वो अपने देश या विदेश

आर्य”अन्तर तो कुछ होता परिवेश का

जैसा देश, वैसा भेष,वैसा ही सन्देश।

 

अरुण कुमार आर्य

मुग़ल सराय ,चन्दौली।

 

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